जमशेदपुर इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड के लंबे समय से चल रहे दिवाला समाधान (सीआईआरपी) मामले में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रॉपिकल वेंचर्स कंपनी लिमिटेड को कंपनी की “रिलेटेड पार्टी” माना है। इसके साथ ही न्यायाधिकरण ने ट्रॉपिकल की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्वयं को संबंधित पक्ष नहीं मानने और एचएसबीसी से जुड़े दावे को सुरक्षित ऋण (सिक्योर्ड क्रेडिट) के रूप में स्वीकार करने की मांग की थी। यह मामला इंकैब इंडस्ट्रीज के दिवाला समाधान से जुड़ी तीन अलग-अलग अपीलों पर आधारित था, जिनकी संयुक्त सुनवाई के बाद एनसीएलएटी ने विस्तृत फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण ने माना कि ट्रॉपिकल वेंचर्स की शेयरहोल्डिंग संरचना और कंपनी पर उसके अप्रत्यक्ष नियंत्रण को देखते हुए उसे दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 5(24) के तहत “रिलेटेड पार्टी” माना जाना पूरी तरह उचित है।
अदालत ने कहा कि ट्रॉपिकल वेंचर्स की सहयोगी कंपनी लीडर यूनिवर्सल (मॉरीशस) के माध्यम से इंकैब इंडस्ट्रीज पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित होता है। साथ ही यह भी पाया गया कि दोनों कंपनियों के अंतिम लाभकारी स्वामी (बेनेफिशियल ओनर) नरेश असरानी हैं, जिससे दोनों संस्थाओं के बीच नियंत्रण संबंध स्पष्ट होता है। ऐसे में ट्रॉपिकल को समिति ऑफ क्रेडिटर्स (सीओसी) का सदस्य नहीं बनाया जाना उचित था। एनसीएलएटी ने एचएसबीसी से जुड़े लगभग 37.5 लाख अमेरिकी डॉलर के दावे को भी सुरक्षित ऋण मानने से इनकार कर दिया। न्यायाधिकरण ने कहा कि एचएसबीसी के पक्ष में मूल गारंटी लीडर बरहाद ने नहीं बल्कि उसकी सहायक कंपनी लीडर केबल इंडस्ट्री बरहाद ने दी थी। इसलिए ट्रॉपिकल के पक्ष में उस सुरक्षा अधिकार (सिक्योरिटी इंटरेस्ट) का वैध हस्तांतरण साबित नहीं हो सका। फैसले में विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के प्रावधानों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया। न्यायाधिकरण ने कहा कि किसी विदेशी कंपनी को भारत स्थित संपत्तियों पर सुरक्षा अधिकार प्राप्त करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। रिकॉर्ड में ऐसी कोई अनुमति प्रस्तुत नहीं की गई। इसलिए ट्रॉपिकल स्वयं को सुरक्षित वित्तीय लेनदार (सिक्योर्ड फाइनेंशियल क्रेडिटर) सिद्ध नहीं कर सका।
इस मामले में एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी पेगासस ने ट्रॉपिकल के हजारों करोड़ रुपये के दावे पर भी सवाल उठाए थे। हालांकि न्यायाधिकरण ने यह माना कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल का कार्य केवल दावों का सत्यापन करना है, उनका न्यायिक निर्णय देना नहीं। इसके बावजूद अदालत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा अधिकार संबंधी दावों का परीक्षण कानून के अनुरूप ही किया जाना चाहिए। एनसीएलएटी ने वेदांता लिमिटेड की समाधान योजना (रिजॉल्यूशन प्लान) को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि समिति ऑफ क्रेडिटर्स द्वारा 99.37 प्रतिशत मतों से स्वीकृत योजना व्यावसायिक विवेक (कॉमर्शियल विजडम) के आधार पर पारित की गई थी और इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता न्यायाधिकरण ने यह भी माना कि समाधान योजना के तहत ट्रॉपिकल के लिए निर्धारित राशि फिलहाल ब्याजयुक्त खाते में सुरक्षित रखी गई है, जो अंतिम न्यायिक निर्णय के अधीन रहेगी। इस फैसले को दिवाला कानून, विदेशी निवेश, सुरक्षा अधिकारों और संबंधित पक्ष (रिलेटेड पार्टी) की व्याख्या के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में विदेशी निवेशकों, वित्तीय लेनदारों और समाधान प्रक्रिया से जुड़े पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को लेकर स्पष्ट कानूनी दिशा मिलने की उम्मीद है।
