स्टील निर्माण में हाइड्रोजन को भविष्य के ईंधन के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसकी ऊंची लागत के कारण बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना चुनौती बना हुआ है। हाइड्रोजन आधारित स्टील उत्पादन को किफायती बनाने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर की कीमत घटाने और ऐसी तकनीक विकसित करने की जरूरत है, जिससे मौजूदा स्टील प्लांट के ढांचे में बड़े बदलाव किए बिना उत्पादन किया जा सके। यह बात जाने-माने वैज्ञानिक और नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वीके सारस्वत ने गुरुवार को सर्कॉन-2026 के उद्घाटन के बाद संवाददाताओं से बातचीत में कही।
डॉ. सारस्वत ने कहा कि मौजूदा स्पंज आयरन संयंत्रों का डिजाइन सामान्यतः हॉरिजॉन्टल होता है। इन्हें हाइड्रोजन के अनुकूल बनाने के लिए वर्टिकल डिजाइन में बदलने पर भारी निवेश करना पड़ेगा। ऐसे में ऐसी तकनीक विकसित करने की जरूरत है, जिसमें संयंत्र का मौजूदा ढांचा बरकरार रहे और हाइड्रोजन का इस्तेमाल भी आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो सके।
इलेक्ट्रोलाइजर का उत्पादन बढ़ने से कम होगी लागत
उन्होंने कहा कि हाइड्रोजन की लागत घटाने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर का बड़े पैमाने पर उत्पादन जरूरी है। उत्पादन बढ़ने से प्रति इकाई लागत में कमी आएगी। उद्योगों, वैज्ञानिक संस्थानों और शोध प्रयोगशालाओं को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा, ताकि हाइड्रोजन आधारित स्टील उत्पादन को व्यावहारिक बनाया जा सके। डॉ. सारस्वत के अनुसार, टाटा स्टील भी इस दिशा में काम कर रही है। जमशेदपुर के ब्लास्ट फर्नेस में हाइड्रोजन डालने का परीक्षण किया गया है। कंपनी हाइड्रोजन को वैकल्पिक अपचायक के रूप में विकसित करने और भविष्य में इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम कर रही है।
