अक्सर लोग चेस्ट एक्स-रे नॉर्मल आने पर यह सोचकर राहत महसूस करते हैं कि उनके फेफड़ों में कोई समस्या नहीं है, लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि हर मामले में ऐसा नहीं होता और यदि खांसी, सांस फूलना या सीने में दर्द जैसे लक्षण बने रहें तो सिर्फ नॉर्मल एक्स-रे पर निर्भर रहना सही नहीं है, क्योंकि डॉ. जोशी के अनुसार लगातार खांसी और सांस की परेशानी के पीछे अस्थमा, क्रॉनिक एयरवे डिजीज, एलर्जी, एसिड रिफ्लक्स और फेफड़ों से जुड़ी अन्य समस्याएं हो सकती हैं, जिसके कारण डॉक्टर मरीजों के लक्षणों की अवधि और गंभीरता का मूल्यांकन करते हैं और सीधे सीटी स्कैन करवाने के बजाय सबसे पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री जैसे धूम्रपान, धूल-धुएं या केमिकल के संपर्क, पुराने इंफेक्शन और पुरानी बीमारियों के बारे में जानकारी लेते हैं, और इसके बाद सांस की क्षमता व वायुमार्ग की रुकावट जांचने के लिए स्पाइरोमेट्री जैसे टेस्ट की सलाह दी जाती है जो अस्थमा और सीओपीडी जैसी बीमारियों के निदान में उपयोगी होते हैं, और यदि गंभीर समस्या का संदेह हो तो एक्स-रे से अधिक विस्तार से फेफड़ों को दिखाने वाला चेस्ट सीटी स्कैन कराया जाता है, साथ ही स्थिति के अनुसार ऑक्सीजन स्तर, ब्लड टेस्ट, बलगम जांच और अन्य परीक्षण भी किए जा सकते हैं क्योंकि लगातार खांसी, खांसी में खून आना, बिना वजह वजन घटना, बार-बार सीने में संक्रमण, लगातार सीने में दर्द और सांस की तकलीफ जैसे लक्षण आगे की जांच की मांग करते हैं, और हर मरीज के लिए अलग-अलग जांचों जैसे एलर्जी टेस्ट, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, फेनो टेस्ट, पेट-स्कैन या जटिल स्थिति में ब्रोंकोस्कोपी, ईबस और थोरेकोस्कोपी की जरूरत पड़ सकती है, और डॉक्टर यह भी समझाते हैं कि जांच का फैसला डर से नहीं बल्कि लक्षणों और रिस्क कारकों से तय होना चाहिए क्योंकि हर लंबी खांसी गंभीर नहीं होती लेकिन उसका कारण पता होना आवश्यक है, इसलिए विश्व फेफड़ा दिवस पर डॉक्टरों का यह स्पष्ट संदेश है कि यदि आपके लक्षण बने हुए हैं तो एक्स-रे नॉर्मल आने के बाद भी उन्हें नजरअंदाज न करें क्योंकि सही समय पर सही जांच कराना ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है।
