September 8, 2026
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पाकिस्तान के लिए आंतरिक सुरक्षा अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में विद्रोही हिंसा के बीच सुरक्षा बलों की मौतों में लगातार इजाफा हुआ है। खासकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वाह में सुरक्षा बलों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, BLA से जुड़े संघर्षों में सुरक्षाकर्मियों की मौत TTP से जुड़े मामलों से अधिक रही है। वर्ष 2024 में BLA से संबंधित घटनाओं में 151 सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि TTP से जुड़े मामलों में 71 मौतें हुईं। 2025 में BLA के साथ संघर्ष में 339 और TTP से जुड़े मामलों में 174 सुरक्षाकर्मी मारे गए। इस साल सितंबर की शुरुआत तक BLA से जुड़े संघर्षों में 136 और TTP से संबंधित मामलों में 87 सुरक्षाकर्मियों की मौत सामने आ चुकी है। हालांकि, सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों में हमलावरों की पहचान या हमले की प्रकृति स्पष्ट नहीं होती, इसलिए कुछ घटनाएं अप्रत्यक्ष या अज्ञात श्रेणी में दर्ज की जाती हैं।

पिछले तीन वर्षों के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। 2023 में 532 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी। अगले साल यह संख्या 754 पहुंच गई, यानी 41.7 फीसदी की वृद्धि हुई। 2025 में मौतों का आंकड़ा बढ़कर 1,229 हो गया, जो सालाना आधार पर करीब 63 फीसदी ज्यादा था। 2026 में आठ महीने के भीतर 957 सुरक्षाकर्मियों की मौत का आंकड़ा सामने आया है।

इन मौतों का बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वाह में दर्ज हुआ है। 2025 में बलूचिस्तान में 751 और खैबर पख्तूनख्वाह में 455 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। दोनों प्रांतों में हुई 1,206 मौतें देशभर में दर्ज 1,229 मौतों के मुकाबले बेहद बड़ा हिस्सा थीं। इस साल अब तक बलूचिस्तान में 630 और खैबर पख्तूनख्वाह में 280 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। आंकड़ों के हिसाब से करीब 68 फीसदी मौतें अकेले बलूचिस्तान में हुई हैं।

सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि दोनों इलाकों में अलग-अलग विद्रोही और आतंकी चुनौतियां सक्रिय हैं। खैबर पख्तूनख्वाह में TTP प्रमुख खतरे के रूप में सामने आता है, जबकि बलूचिस्तान में BLA से जुड़े संघर्ष सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक बयानबाजी के मोर्चे पर भी हाल में फिर से तल्खी देखने को मिली है। संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के नक्शे से संबंधित एक प्रस्ताव पर भारत ने 4 सितंबर को समर्थन में मतदान किया। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव का जम्मू-कश्मीर, लद्दाख या किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा के राजनीतिक दर्जे से कोई संबंध नहीं है। पाकिस्तान ने इसके बावजूद अगले दिन भारत के रुख की आलोचना की और जम्मू-कश्मीर पर अपना पुराना दावा दोहराया।

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