July 11, 2026
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राज्य सरकार द्वारा मिड-डे मील योजना के बजट में बढ़ोतरी कर इसे प्रति छात्र 10 रुपये 17 पैसे किए जाने के बाद से स्कूलों में खिचड़ी, चावल, दाल, राजमा और सोयाबीन जैसे पौष्टिक भोजन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। लेकिन इस तय मेनू से हटकर मालदा के अंग्रेजी बाजार ब्लॉक स्थित ‘सेकंदरपुर मैनेज्ड प्राथमिक विद्यालय’ ने एक बेहद अनोखी और सराहनीय पहल की है। छोटे बच्चों को पोषण देने और उन्हें नियमित स्कूल आने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से स्कूल ने मिड-डे मील के मेनू में जिले के विश्व प्रसिद्ध आम को शामिल किया है।शिक्षकों और स्थानीय अभिभावकों के आपसी सहयोग से, आम के इस पूरे सीजन में हर दिन मिड-डे मील के साथ छात्र-छात्राओं को हिमसागर, लक्ष्मणभोग और लंगड़ा जैसी विभिन्न प्रजातियों के रसीले आम परोसे जा रहे हैं। रोजाना के तय चावल, दाल और सब्जी के साथ बच्चों को अलग से कटोरी में आम दिया जा रहा है।
विद्यालय के सहायक प्रभारी शिक्षक विवेक बरण मंडल ने बताया कि पहले केवल विशेष अवसरों पर ही बच्चों को आम या अन्य विशेष पकवान दिए जाते थे। लेकिन चूंकि इस क्षेत्र में आम के कई बागान हैं, इसलिए स्थानीय अभिभावक अक्सर खुद ही स्कूल में स्वेच्छा से आम दे जाते हैं। वहीं, कई बार शिक्षक भी अपनी जेब से पैसे खर्च कर आम खरीद लाते हैं ताकि बच्चों को खिला सकें। उन्होंने बताया कि जब तक आम का सीजन रहेगा, यह पहल जारी रहेगी। इतना ही नहीं, पिछले तीन वर्षों से इस स्कूल में बकायदा ‘आम उत्सव’ भी आयोजित किया जा रहा है।स्कूल की इस अनूठी पहल से बच्चे बेहद उत्साहित हैं। चौथी कक्षा की छात्रा अद्रिजा मंडल ने बताया, “रोजाना पढ़ाई और टिफिन के बाद हमें मिड-डे मील दिया जाता है। चावल, दाल और सब्जी के साथ अब अलग कटोरी में आम भी मिलता है। घर के साथ-साथ स्कूल में भी रोज आम खाने को मिल रहा है, जिससे हमें बहुत अच्छा लगता है और रोज स्कूल आने का मन करता है।”
स्कूल प्रशासन के अनुसार, पांचवीं कक्षा तक के इस विद्यालय में कुल 125 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। इस नई और आकर्षक पहल के बाद से स्कूल में छात्रों की उपस्थिति लगभग शत-प्रतिशत रहने लगी है। बच्चों में पौष्टिक भोजन की आदत डालने के साथ-साथ उन्हें स्कूल के प्रति आकर्षित करना ही इस पहल का मुख्य उद्देश्य है। इसके अलावा, इस स्कूल में रोज छुट्टी से पहले बच्चों के लिए ‘सामाजिक शिक्षा’ (Moral Education) की एक विशेष क्लास भी आयोजित की जाती है।सरकारी बजट का सही उपयोग करने के साथ-साथ विद्यालय के शिक्षकों की इस निजी और रचनात्मक कोशिश की स्थानीय अभिभावकों, शिक्षा जगत और पूरे इलाके के निवासियों द्वारा जमकर सराहना की जा रही है।

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