भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मुद्रा बाजार में अस्थिरता को रोकने के लिए रुपये से जुड़े डेरिवेटिव सौदों पर कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए हैं, जिसके कारण व्यापारियों को अपने ‘आर्बिट्राज’ दांव को तेजी से वापस लेना पड़ रहा है। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब व्यापारियों के पास विदेशी मुद्रा के लेन-देन के लिए वास्तविक प्रमाण होना अनिवार्य है, जिससे सट्टेबाजी की गुंजाइश खत्म हो गई है। इस सख्ती के चलते घरेलू और विदेशी बाजारों के बीच जो मूल्य अंतर था, वह अब खत्म होने की कगार पर है, क्योंकि ट्रेडर भारी मात्रा में अपनी पोजीशन को बंद कर रहे हैं। यह घटनाक्रम २८ मार्च २०२६ तक के बाजार रुझानों को दर्शाता है।
इस नीतिगत बदलाव का सीधा असर बाजार की तरलता पर पड़ा है, जिससे ट्रेडिंग वॉल्यूम में भारी गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि जहां पहले ट्रेडर मामूली अंतर से मुनाफा कमाते थे, वहीं अब नियामक बाधाओं के कारण लागत बढ़ गई है और जोखिम लेना मुश्किल हो गया है। आरबीआई का मुख्य उद्देश्य रुपये की विनिमय दर में होने वाले कृत्रिम उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है, लेकिन अल्पकालिक रूप से इसने हेज फंड्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए चुनौती पैदा कर दी है। आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर होगी कि क्या ये कड़े नियम भारतीय मुद्रा को वैश्विक झटकों से बचाने में सफल हो पाते हैं।
