भारतीय रिजर्व बैंक ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये को स्थिरता देने के लिए ‘धुरंधर’ और ‘द रिवेंज’ जैसे कड़े कदम उठाए हैं। वित्त वर्ष २०२६ में डॉलर के मुकाबले रुपये में १० प्रतिशत की भारी गिरावट और मार्च में ४ प्रतिशत की अतिरिक्त कमी के बाद, केंद्रीय बैंक ने बैंकों द्वारा की जाने वाली सट्टेबाजी पर लगाम लगा दी है। आरबीआई ने बैंकों के ‘एग्रीगेट नेट ओपन पोजीशंस’ की सीमा को १० अप्रैल तक घटाकर १०० मिलियन डॉलर कर दिया है। इसके साथ ही, बैंकों को कॉर्पोरेट्स के लिए ‘नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स’ पेश करने से रोक दिया गया है, ताकि ऑफशोर और ऑनशोर बाजारों के बीच होने वाले आर्बिट्राज ट्रेड (मुनाफाखोरी) को पूरी तरह बंद किया जा सके।
इन सख्त उपायों का तत्काल सकारात्मक प्रभाव बाजार पर देखा गया, जहाँ गुरुवार को रुपया १.८ प्रतिशत की मजबूती के साथ ९३.१० के स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले १३ वर्षों में रुपये की एक दिन में सबसे बड़ी बढ़त है। आरबीआई ने न केवल फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की री-बुकिंग पर प्रतिबंध लगाया है, बल्कि अब कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके सौदे वास्तविक व्यावसायिक जरूरतों के लिए हैं, न कि केवल ट्रेडिंग के लिए। हालांकि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें १०० डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन आरबीआई के इन ‘धुरंधर’ फैसलों ने सट्टेबाजों के लिए सभी रास्ते बंद कर दिए हैं। १० अप्रैल तक बैंकों को अपने अतिरिक्त डॉलर बेचने होंगे, जिससे आने वाले दिनों में रुपये को और अधिक समर्थन मिलने की उम्मीद है।
